Raigarh Fort : सह्याद्रि पहाड़ियों पर करीब 5.12 वर्ग किलोमीटर में फैला रायगढ़ किला रायगढ़ जिले के महाद से 27 किलोमीटर और मुम्बई से करीब 166 किलोमीटर पड़ता है। यह समुद्र तल से 1,350 मीटर (अधिकतम) की ऊंचाई पर स्थित और चारों दिशाओ में विशाल चट्टानों से घिरा हुआ है। यहां तक पहुंचने के लिए 1,737 सीढियां चढ़नी पड़ती हैं।
न्यूज हवेली नेटवर्क
मरू सागर एक्सप्रेस सूरत से रात एक बजे रवाना हुई और सवेरे ठीक सात बजकर दो मिनट पर हम वीर रेलवे स्टेशन पर थे। यहां से टैक्सी कर हम करीब सवा घण्टे में रायगढ़ किले (Raigarh Fort) की तलहटी पर पहुंच गये। हमारी यह यात्रा छत्रपति शिवाजी से जुड़े स्थानों खासकर किलों को देखने के उद्देश्य से थी। वैसे तो शिवाजी के राज में कई किले उनकी शासकीय और युद्धक गतिविधियों के केन्द्र रहे पर उनमें रायगढ़ दुर्ग (Raigarh Fort) को प्रमुख माना जाता है।
सह्याद्रि पहाड़ियों पर करीब 5.12 वर्ग किलोमीटर में फैला रायगढ़ किला (Raigarh Fort) रायगढ़ जिले के महाद से 27 किलोमीटर और मुम्बई से करीब 166 किलोमीटर पड़ता है। यह समुद्र तल से 1,350 मीटर (अधिकतम) की ऊंचाई पर स्थित और चारों दिशाओ में विशाल चट्टानों से घिरा हुआ है। यहां तक पहुंचने के लिए 1,737 सीढियां चढ़नी पड़ती हैं। इतनी सीढ़ियां चढ़ने के लिए अच्छा-खासा दमखम चाहिए। हालांकि अबरायगढ़ रोपवे (एरियल ट्रमवे) ने इस समस्या को दूर कर दिया है और मात्र 30 से 40 मिनट में किले तक पहुंचा जा सकता है।

रायगढ़ किले (Raigarh Fort) में प्रवेश के लिए कई दरवाजे थे। नगरखाना दरवाजे से आम लोग किले में प्रवेश करते थे। मीना दरवाजे से महिलाएं प्रवेश करती थीं। इस दरवाजे से होते हुए सीधे रानी महल पहुंचते थे। पालखी दरवाजे से राजा और उनका दल प्रवेश करता था। महल के मुख्य दरवाजे को महादरवाजा कहा जाता था जो आज भी शान से खड़ा है। पालखी दरवाजे के एक ओर तीन अंधेरे कमरे हैं। इतिहासकारों का मानना है कि ये कमरे किले के अन्न भंडार थे। जल प्रबन्धन के लिए कई तालाब बनाए गये थे।किले के भग्नावशेष के सामने छत्रपति शिवाजी की प्रतिमा स्थापित की गयी है।
रायगढ़ किले का इतिहास (History of Raigarh Fort )

रायगढ़ किले का निर्माण वर्ष 1030 के आसपास हुआ था और इसे रायरी के नाम से जाना जाता था। 1656 ईस्वी में शिवाजी ने चन्द्रराव मोरे को पराजित कर इस पर कब्जा कर लिया। उन्होंने रायरी को अपनी राजधानी चुना और इसका नाम रायगढ़ रखा। इस किले की भौगोलिक स्थिति, रणनीतिक महत्व व अन्य विशेषताओं को देखते हुए उन्होंने इसे अपनी राजधानी बनाया। छह जून 1674 को उनका राज्याभिषेक यहीं पर हुआ था। अबाजी सोनदेव और हिरोजी इन्दुल्कर ने यहां करीब 300 घर बनाने के साथ ही कई अन्य निर्माण कार्य करवाए। शिवाजी के जीवित रहने तक यह किला अविजित रहा। तीन अप्रैल 1680 को शिवाजी के निधन के बाद उनके पुत्र सम्भाजी राव ने यहां का शासन संभाला। वर्ष 1689 में मुगल सेनापति ज़ुल्फ़िकार खान ने रायगढ़ किले पर कब्जा कर लिया और छठे मुगल बादशाह औरंगज़ेब ने इसका नाम बदलकर इस्लामगढ़ कर दिया। कुछ समय बाद मराठों ने एक बार फिर इस पर कब्जा कर लिया और 1818 तक यहां पर उनका शासन रहा। इसी दौरान भारत में अपने पंजे फैला रही ईस्ट इण्डिया कम्पनी की नजर भी इस किले पर थी। कम्पनी की सेना ने 1818 में कलकई की पहाड़ी से भारी गोलाबारी कर इस किले को बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर अपने नियन्त्रण में ले लिया। आज की तारीख में यह किला महाराष्ट्र शासन के पुरातत्व विभाग के अधीन संरक्षित स्मारक है।
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रायगढ़ किले व आसपास के दर्शनीय स्थान (Raigarh Fort and surrounding places of interest)
महादरवाजा :

महादरवाजे के बाहर के दोनों बाजू में दो सुन्दर कमलकृतियां हैं। दरवाजे पर रखेइन कमलो का अर्थ है कि किले के अंदर “श्री और सरस्वती” का वास है। महादरवाजे के बुर्ज अत्यन्त भव्यहैं। इनमें एक 75 फिट और दूसरा 65 फुट उंचा है। किले की दीवारों पर बने छेदों को“जंग्या”कहते हैं जिनसे शत्रुओं पर हमला किया जाता था। महादरवाजे से जुड़े हुए कुछ कमरे भी हैं। महादरवाजे से दायीं ओर टकमक सिरे तक और बायीं ओर हिरकणी सिरे तक मजबूत किलेबन्दी की गयी है।
नाना दरवाजा : इसे “नाणे दरवाजा” भी कहते हैं जिसका अर्थ है छोटा दरवाजा। अंग्रेज वकील हेनरी ऑक्झेंडन इसी दरवाजे से किले के अन्दर आया था। इस दरवाजे को दो कमान और भीतरी बाजू में पहरेदारों के लिए दो छोटे कमरे हैं।
मदारमोर्चा : इसे मशीदमोर्चा भी कहा जाता है। इस खुली जगह के उपर पुरानी खण्डहर इमारत दिखाई देती है जिसमें एक तरफ पहरेदारों की जगह और दूसरी ओर अनाज रखने की कोठरियां हैं। यहां मदनशहा नाम के साधू के पार्थिव अवशेष और एक तोप भी दिखती है। चट्टानों को खोदकर बनायी गयी तीन गुफाएं भी हैं।
चोरदिण्डी : महादरवाजे के दायीं ओर टकमक सिरे तक जो तटबंदी की गयी है वह यहीं पर समाप्त होती है। यहीं पर बुर्ज में चोरदिण्डी बंधी है। बुर्ज के अन्दर दरवाजे तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां हैं।
हाथी तालाब : महादरवाजे से थोड़ा आगे बढ़ने पर जो तालाब दिखता है, उसी को हाथी तालाब कहते हैं। गजशाला के हाथी यहीं पर स्नान करते थे। उनकी प्यास बुझाने के लिए भी इसी के पानी का इस्तेमाल होता था।
गंगासागर तलाब :

हाथी तालाब के पास ही एक धर्मशाला है जिसके दक्षिण की ओर पचास से साठ कदम चलने पर गंगासागर तालाब है। शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक के बाद इसमें सप्तसागर और गंगा समेत कई पवित्र नदियों से लाया गया जल डाला गया था।
स्तम्भ :गंगासागर के दक्षिण में दो ऊचे मनोरे स्तम्भ हैं। पहले ये पांच मंजिला थे।
पालखी दरवाजा : स्तम्भ के पश्चिम भाग पर 31 सीढियां हैं जिन्हें चढ़ने परजो दरवाजा आता है, उसी को पालखी दरवाजा कहते हैं। इस दरवाजे से बालकनी में प्रवेश कर सकते हैं।
मेणा दरवाजा :पालखी दरवाजे से ऊपर प्रवेश करने के बाद चढ़ाई-उतार वालाएक मार्ग मेणा दरवाजे तक ले जाता है। इसके दायीं ओर सात रानियों के महलों के अवशेष हैं। इस दरवाजे की बालकनी से आप सहयाद्रि का विहंगम दृश्य देख सकते हैं।
राजभवन : शिवाजी महाराज इसी स्थान पर राजकाज किया करते थे। इसका चौक 86 फिट लम्बा और 33 फिट चौड़ा है। निर्माण के समय इसमें दोहरा पोडियम और लकड़े के स्तम्भ लगाये गये थे। खण्डहर हो चुके इस भवन की संरचना मराठा युग की वास्तुकाल को दर्शाती है। यहां प्राचीन काल का शाही स्नानागार भी है।
खलबतखाना : राजभवन के पास स्तम्भ के पूर्व की ओर की खुली जगह पर एक तलघर है जिसको खलबतखाना कहते हैं। कहा जाता है कि मराठा शासन के समय गुप्त मंत्रणाएं और आपातकालीन बैठकें यहीं पर होती थीं।
नगारखाना :सिंहासन के सामने वाले भव्य प्रवेश द्वार को ही नगारखाना कहते हैं। नगारखाने से सीढियां चढ़ कर जिस स्थान पर पहुंचते हैं, वह इस किले का सर्वाधिक उंचा स्थान है।
बाजार : नगारखाना से बायीं ओर उतरने पर सामने जो खुली जगह दिखायी देती है वह“होलीचा माल” है। यहां पर छत्रपति शिवाजी की भव्य प्रतिमा स्थापित की गयी है। इस प्रतिमा के सामने दो पंक्तियों में जो भव्य अवशेष दिखायी देते हैं, वे ही शिवाजी महाराज के जमाने का बाजारपेठ है। इसकी दोनों पंक्तियों में 22-22 दुकानें हैं। बीच में 40 फिट चौड़ा रस्ता है।
जीजा माता महल : यह महल शिवाजी महाराज की माता जीजाबाई को समर्पित है। जीजाबाई की समाधि भी यहीं पर है। यह महल अपनी मूल संरचना और भव्यता को खो चुका है।
मां साहेबा का बाड़ा : वृद्धावस्था में जीजाबाई को किले की ठण्डी आबोहवा से परेशानी होने लगी। इसे देखते हुए शिवाजी महाराज ने उनके लिए पाचाड़ के पास एक बाड़ा बनवाया था। यहां जीजाबाई के बैठने के लिए बनाया गया पत्थर का आसन और सीढ़ियों वाला कुआं अब भी मौजूद हैं।
खुबलढ़ा बुरूज :किले पर चढाई करते समय एक बुर्ज दिखाई देता है जिसे खुबलढ़ा बुर्ज कहते हैं। इसके पास ही एक दरवाजा था जिसे “चित्त दरवाजा” कहते थे। यह दरवाजा अब पूर्णरूप से क्षतिग्रस्त हो चुका है।
शिर्काई मन्दिर :

यह छोटा-सा मन्दिर शिवाजी के प्रतिमा के बायीं ओर है। शिर्काई इस किले के मुख्य देवता हैं। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के जमाने में मावलकर नाम के अभियन्ता ने यह मन्दिर बनवाया था। यह शिर्काई का मुख्य मंदिर नहीं है लेकिन मूर्ति प्राचीन है। मुख्य शिर्काई मन्दिर राजवाड़े से लगकर दायीं ओर होली बादबमाला में था जहां मन्दिर का चबूतरा आज भी है।
जगदीश्वर मन्दिर : बाजारपेठ के निचले बाजू में पूर्व दिशा में उतार पर ब्राह्मणबस्ती, ब्राह्मणतालाब आदि के अवशेष हैं। इसके सामने जगदीश्वर मन्दिर है। गर्भ गृह के सामने नन्दी की भव्य प्रतिमा है जो अब काफी हद तक क्षतिग्रस्त हो चुकी है। मन्दिर में प्रवेश करने पर सभामण्डप आता है जिसके मध्य भाग में कछुए की सुन्दर प्रतिमा है। मन्दिर के मुख्य भाग में हनुमानजी की भव्य मूर्ति है। मन्दिर के प्रवेशद्वार की सीढ़ियों के नीचे एक छोटा-सा शिलालेख दिखाई देता है। दरवाजे के दाएं बाजू की ओर दीवार पर भी एक शिलालेख हैं।
महाराजांची समाधी : अंग्रेजों ने रायगढ़ का किला जीतने के बाद स्थानीय लोगों के इसमें जाने पर पाबन्दी लगा दी। उसके बाद लगभग छह दशक तक यह किला मानव रहित ही रहा। इस कारण यहां हजारों पेड़-पौधे और झाड़ियां उग आये। 1869 में महात्मा ज्योतिराव फुले ने इस समाधि की खोज की थी। छत्रपति शिवाजी के बेटे सम्भाजी महाराज द्वारा बनवायी गयी मूल समाधि एक अष्टकोणीय संरचना है जिसके ऊपर गुम्बद है। 1895 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने श्री शिवाजी फण्ड समिति की स्थापना की थी। उन्होंने इस समिति के माध्यम से फण्ड जुटाकर समाधि का पुनर्निर्माण कराया।
कुशावर्त तलाब : होलीचा माल के बाएं हाथ छोड़कर दायीं ओर का रास्ता कुशावर्त तलाब की ओर जाता है। तालाब के पास महादेव का एक छोटा-सा मन्दिर है जिसके सामने टूटी अवस्था में नन्दी दिखाई देता है।
टकमक टोक :

बाजारपेठ से नीचे उतर कर सामने के टेपा से टकमक सिरेतक एक रास्ता जाता है। टकमक टोक समुद्र तल से 1,200 फीट की ऊंचाई पर है। मृत्युदण्द की सजा पाने वालों को इसी स्थान से मारने के लिए घाटी में फेंक दिया जाता था। अब यह रायगढ़ किले का प्रमुख आकर्षण है। इसी के पास दारूका कोठार के अवशेष हैं।
माहिरकणी टोक : गंगासागर की पश्चिम दिशा की ओर एक संकरा मार्ग माहिरकणी टोक तक जाता है। यहां बुर्ज पर एक तोप रखी हुई है।
चौदर तालाब : महाद शहर के मध्य में चौदर तालाब है। पहले पिछड़ी जाति के लोगों को इस तालाब से पानी लेने से मनाही थी। सन् 1927 में भीमराव आम्बेडकर ने इस तालाब के पानी को लेकर चली आ रही इस शर्मनाक परम्परा को तोड़ दिया। इस घटना को महाद सत्याग्रह के नाम से जाना जाता है।
सबनाला झरना :माना जाता है कि इस झरने के पानी में रोगनाशक शक्तियां हैं और इसमें नहाने से किसी भी प्रकार का चर्म रोग दूर हो जाता है।
शिवतारगढ़ गुफा : रायगढ़ किले से करीब 55 किलोमीटर दूर शिवतारगढ़ नामक एक ऐतिहासिक गुफा है। कहा जाता है कि शिवाजी के आध्यात्मिक गुरु रामदास ने इस गुफा में 16 वर्षों तक निवास किया था। कुछ लोगों का यहां तक मानना है कि उन्होंने इसी गुफा में दसबोध नामक ग्रन्थ की रचना की थी।
वालान कुण्ड :यह ताजे पानी का एक कुण्ड है। इस कुण्ड में खाने की कोई वस्तु फेंकेने पर सात बार मछलियां उसे खाने के लिए बाहर आती हैं लेकिन हर बार उनका अलग-अलग झुण्ड बाहर आता है और बाद में आने वाला झुण्ड पहले वाले से बड़ा होता है।
मधे घाट जलप्रपात :रायगढ़ किले के पास स्थित यह प्रपात रायगढ़ जिले के एक प्रमुख पर्यटन स्थल है। पहाड़ और घने जंगल इसकी सुन्दरता को और निखार देते हैं।
Mehrangarh Fort : मेहरानगढ़ : राजस्थान के जोधपुर में “सूरज का किला”
कब जायें रायगढ़ दुर्ग (When to go to Raigarh Fort)

रायगढ़ किला (Raigarh Fort) घूमने के लिए सबसे अच्छा मौसम मानसून और सर्दियों का माना जाता हैं। मानसून के दौरान पर्यटक ट्रैकिंग और हाइकिंग जैसी शानदार गतिविधियों का हिस्सा बन सकते हैं।
ऐसे पहुंचें रायगढ़ दुर्ग (How to reach Raigarh Fort)

वायु मार्ग : निकटतम हवाईअड्डा पुणे इण्टनेशनल एयरपोर्ट यहां से 143 किलोमीटर जबकि मुम्बई का छत्रपति शिवाजी इण्टरनेशनल एयरपोर्ट करीब 171 किमी दूर है।
रेल मार्ग : महाद तालुका में स्थित वीर रेलवे स्टेशन रायगढ़ किले का निकटतम रेल हेड है जो यहां से करीब 37 किलोमीटर पड़ता है। बड़े रेलवे स्टेशनों में मुम्बई का छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनल यहां से करीब 177 किलोमीटर जबकि पुणे जंक्शन लगभग 134 किमी दूर है।
सड़क मार्ग :रायगढ़ किले से रायगढ़ 27 किमी, अलीबाग 108,पुणे 131 जबकि मुम्बई लगभग 166 किमी दूर है। मुम्बई से पनवेल होते हुए यहां तक पहुंचने में साढ़े तीन से चार घण्टे तक लग जाते हैं।
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