Fri. Apr 4th, 2025
नैमिषारण्य तीर्थ, सीतापुर

ब्रह्म पुराण एवं पद्म पुराण के अनुसार ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना के लिए नैमिषारण्य में ही यज्ञ किया था और अपने शरीर को दो भागों में बांट कर मनु और शतरूपा की उत्पत्ति की जिसके बाद सृष्टि में नर-नारी का अस्तित्व हुआ। नैमिषारण्य में ही वेद व्यास ने पुराण लिखे थे।

निर्भय सक्सेना

हुत समय से इच्छा थी नैमिषारण्य (Naimisharanya) जाने की। एक दिन कायस्थ चेतना मंच के सदस्यों के साथ बातचीत में इस तीर्थक्षेत्र जाने का कार्यक्रम बन गया। तय हुआ कि बरेली के कर्मचारी नगर से एक मिनी बस नैमिषारण्य के लिए रवाना होगी। निर्धारित दिन हम 30 लोग प्रातः नौ बजे नैमिषारण्य के लिए रवाना हो गये। रास्ते में दो जगह कुछ देर आराम और नाश्ता-पानी कर आगे की राह पकड़ी और ठीक ढाई बजे हम नैमिषारण्य में थे।

यहां के एक आश्रम में दोपहर के भोजन की व्यवस्था पहले से ही तय थी। भोजन कर हम लोगों ने छह ई-रिक्शा किराये पर लिये और चल पड़े तीर्थ क्षेत्र के भ्रमण के लिए। नैमिषारयण्य तीर्थ क्षेत्र उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में गोमती नदी के बाएं तट पर स्थित है। मार्कण्डेय पुराण में अनेक बार इसका उल्लेख 88,000 ऋषियों की तपोभूमि के रूप में आया है। वायु पुराणान्तर्गत माघ माहात्म्य एवं बृहद्धर्मपुराण के अनुसार इसके किसी गुप्त स्थल में आज भी ऋषियों का स्वाध्यायानुष्ठान चलता है।

वराह पुराण के अनुसार यहां भगवान द्वारा निमिष मात्र में दानवों का संहार करने के कारण यह स्थान नैमिषारण्य कहलाया। वायु, कूर्म आदि पुराणों के अनुसार भगवान के मनोमय चक्र की नेमि (हाल अथवा सुदर्शन चक्र की बाहरी सतह) यहीं विशीर्ण हुई (गिरी) थी, अतएव यह नैमिषारण्य (Naimisharanya) कहलाया। कहा यह भी जाता है कि जिस स्थान पर चक्र पृथ्वी से टकराया था वहां पानी का झरना निकल आया।

प्रययुस्तस्य चक्रस्य यत्र नेमिर्व्यशीर्यत।

तद् वनं तेन विख्यातं नैमिषं मुनिपूजितम्॥

ब्रह्म पुराण एवं पद्म पुराण के अनुसार ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना के लिए नैमिषारण्य में ही यज्ञ किया था और अपने शरीर को दो भागों में बांट कर मनु और शतरूपा की उत्पत्ति की जिसके बाद सृष्टि में नर-नारी का अस्तित्व हुआ। नैमिषारण्य में ही वेद व्यास ने पुराण लिखे थे। शौनकजी को इसी तीर्थ में सूतजी ने अठारहों पुराणों की कथा सुनायी थी। पहली बार सत्यनारायण की कथा भी नैमिषारण्य में ही की गयी थी। द्वापर में भगवान बलराम यहां पधारे थे। भूल से उनके हाथों लोमहर्षण सूत की मृत्यु हो गयी। बलराम जी ने उनके पुत्र उग्रश्रवा को वरदान दिया कि वे पुराणों के वक्ता होंगे। बलराम ने यहीं पर ऋषियों को सताने वाले राक्षस बल्वल का वध किया। सम्पूर्ण भारत की तीर्थयात्रा करके बलराम फिर नैमिषारण्य आये और यज्ञ किया। नैमिषारण्य (Naimisharanya) की यात्रा के बिना चार धाम की यात्रा अधूरी बताई गयी है।

ब्रह्माजी प्रतिमा, नैमिषारण्य

सन्त कवि सूरदास ने भी यहां निवास किया था। तामिल के वैष्णव सन्तों के ग्रन्थों में भी नैमिषारण्य का उल्लेख मिलता है। नैमिषारण्य इस मायने में अद्वितीय है कि सभी तीर्थ स्थानों में सबसे पहला और सबसे पवित्र होने के नाते अगर कोई यहां 12 साल तक तपस्या करता है तो सीधे ब्रह्मलोक जाता है। नैमिषारण्य की परिक्रमा 84 कोस की है। यह परिक्रमा प्रतिवर्ष फाल्गुन मास की अमावस्या के बाद की प्रतिपदा को आरम्भ होकर पूर्णिमा को पूर्ण होती है ।

नैमिषारण्य (Naimisharanya) का प्राचीनतम उल्लेख वाल्मीकि रामायण के युद्ध-काण्ड की पुष्पिका में प्राप्त होता है। पुष्पिका में उल्लेख है कि लव और कुश ने गोमती नदी के किनारे राम के अश्वमेध यज्ञ में सात दिनों में वाल्मीकि रचित काव्य का गायन किया।

चक्रतीर्थ की महिमा

एक आख्यान के अनुसार महर्षि शौनक के मन में दीर्घकाल तक ज्ञान सत्र करने की इच्छा थी। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उन्हें एक चक्र दिया और कहा, “इसे चलाते हुए चले जाओ। जहां इस चक्र की नेमि (बाहरी परिधि) गिर जाए, उसी स्थल को पवित्र समझकर वहीं आश्रम बनाकर ज्ञान सत्र करो।” शौनकजी के साथ अट्ठासी सहस्र ऋषि थे। वे सब लोग उस चक्र को चलाते हुए घूमने लगे। गोमती नदी के किनारे एक तपोवन में चक्र की नेमि गिर गयी और वहीं पर वह चक्र भूमि में प्रवेश कर गया। उनका चक्र नैमिष में जिस स्थान पर गिरा था, वह स्थल ही आज चक्रतीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है। चक्रतीर्थ षट्कोणीय है। इसका व्यास 120 फुट है। इसमें जल नीचे के स्रोतों से आता है और एक नाले के द्वारा बाहर की ओर बहता रहता है जिसे गोदावरी नाला कहते हैं। चक्रतीर्थ के सरोवर का मध्यभाग गोलाकार है और उससे बराबर जल निकलता रहता है। मध्य के घेरे के बाहर स्नान करने का घेरा है।

नैमिषारण्य धाम

चक्रतीर्थ ही नैमिषारण्य का मुख्य तीर्थ है। यह 51 पितृस्थानों में से एक स्थान माना जाता है। इसके किनारे अनेक मन्दिर हैं। देवराज इन्द्र ने व्रतासुर को मारने के लिए दधीचि मुनि से उनकी हड्डियां मांगी थीं। दधीचि मुनि ने अपनी हड्डियां यहीं पर उन्हें दी थीं जिससे वज्र बनाकर देवराज इन्द्र ने राक्षसों का संहार किया। इन्द्र इसी कुण्ड में स्नान कर ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हुए थे।

मीनाक्षी अम्मन मन्दिर : यहां शिव के साथ हुआ था विष्णु की बहन का विवाह

तीर्थों की भूमि में देव दर्शन

नैमिषारण्य में चक्र तीर्थ के अतिरिक्त व्यास गद्दी, ललिता देवी मन्दिर, हनुमानगढ़ी, मनु-शतरूपा तपोभूमि, चारों धाम मन्दिर, बालाजी मन्दिर, त्रिशक्ति धाम, हत्या हरण तीर्थ, कालिका देवी, काली पीठ, भूतनाथ मन्दिर, कुशावर्त, ब्रह्म कुण्ड, जानकी कुण्ड, पंच प्रयाग आदि प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं। हमारे दल ने तीर्थ क्षेत्र भ्रमण की शुरुआत रुद्रावर्त तीर्थ से की। रुद्रावर्त मन्दिर नैमिषारण्य के मुख्य स्थान से करीब चार किलोमीटर दूर है। यह वह स्थान है जहां भगवान शिव ने रुद्र ताण्डव करने के बाद खुद को ठण्डा करने के लिए गोमती नदी में प्रवेश किया और तपस्या में लग गये। रुद्रावर्त में गोमती नदी में गुप्तेश्वर शिवलिंग है जिस पर बेलपत्री और पांच फल चढ़ाने पर कुछ नदी में नीचे चले जाते हैं और जो वापस आते हैं वही प्रसाद होता है। इस स्थान पर पौराणिक शिव मन्दिर था जो कालान्तर में जल के अन्दर समा गया। मन्दिर के अवशेष नदी में पानी कम होने पर दिखाई देते हैं।

रुद्रावर्त तीर्थ के पश्चात हम ललिता देवी मन्दिर पहुंचे जो यहां का प्रधान मन्दिर है। मान्यता है कि देवी सती के हृदय यहीं पर गिरा था। इसके पश्चात हम हनुमानगढ़ी मन्दिर पहुंचे। माना जाता है कि राम-रावण युद्ध के समय अहिरावण ने जब राम और लक्ष्मण का अपहरण कर लिया तो हनुमान जी पातालपुरी गये। वहां उन्होंने अहिरावण का वध किया अपने कन्धों पर राम और लक्ष्मण को बैठाकर यहीं से दक्षिण दिशा यानी लंका की ओर प्रस्थान किया। इसी कराण यहां हनुमान की दक्षिणमुखी मूर्ति प्रकट हुई। पाण्डवों ने महाभारत के युद्ध के बाद यहीं पर 12 वर्ष तपस्या की थी।

नैमिषारण्य के विभिन्न तीर्थों का भ्रमण करते हुए हम चक्रतीर्थ पहुंचे। यहां कुण्ड में स्नान कर उसके अन्दर ही सात बार परिक्रमा और सीढ़ियों पर दीपदान किया। सायंकाल करीब पौने आठ बजे हम वापस आश्रम पहुंचे और चाय-नाश्ता कर बरेली के लिए रवाना हो गये।

नैमिषारण्य तीर्थ

ऐसे पहुंचें

वायु मार्ग : निकटतम हवाईअड्डा लखनऊ का चौधरी चरण सिंह इण्टरनेशनल एयरपोर्ट यहां से करीब 107 किलोमीटर दूर है।

रेल मार्ग : नैमिषारण्य रेलवे स्टेशन काफी छोटा है और यहां गिनीचुनी ट्रेनों का ही ठहराव है। निकटतम बड़ा स्टेशन सीतापुर जंक्शन यहां से करीब 39 किलोमीटर जबकि सीतापुर सिटी जंक्शन लगभग 45 किलोमीटर पड़ता है।

सड़क मार्ग : सीतापुर उत्तर प्रदेश के लगभग सभी प्रमुख शहरों के साथ सड़क नेटवर्क से अच्छी तरह जुड़ा है। सीतापुर शहर से नैमिषारण्य करीब 41 किमी पड़ता है। सीतापुर से यहां के लिए बस और टैक्सी मिलती हैं। यह तीर्थ क्षेत्र लखनऊ से करीब 91, कानपुर से 124, हरदोई से 43, बरेली से 180 और वाराणसी के लगभग 415 किमी पड़ता है।

 

9 thought on “नैमिषारण्य : 88 हजार ऋषि-मुनियों की तपोभूमि”
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