उत्तराखण्ड के देव-दरबार केवल देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना के लिए ही नहीं, अपितु न्याय के लिए भी जाने जाते हैं। सबसे पहले हम जिला मुख्यालय अल्मोड़ा से आठ किलोमीटर दूर पिथौरागढ़ राजमार्ग पर स्थित चितई में भगवान शिव के अवतार गोलू (गोलज्यू) देवता के मन्दिर पहुंचे।
डॉ. मंजू तिवारी
अल्मोड़ा में कुछ दिन घूमने-फिरने के बाद चितई के गोलज्यू मन्दिर (Chitai Golju Temple) तथा पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट में स्थित हाट कालिका मन्दिर (Haat Kalika Temple) और पाताल भुवनेश्वर (Patal Bhuvaneshwar) जाने का कार्यक्रम बना। पांच जनवरी को प्रातःकाल आठ बजे मेरे और हिना समेत कुल छह लोग कार से रवाना हुए। कमलेश और हिना मुझे रास्ते में पड़ने वाले स्थानों की जानकारी देने के साथ ही अपने अनुभव भी सुनाती जा रही थीं। (From the court of justice to Patal Bhubaneswar via Haat Kalika)
चितई के गोलज्यू देवता मन्दिर में दर्शन-पूजन (Darshan-worship in Golju Devta Temple of Chitai)
उत्तराखण्ड के देव-दरबार केवल देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना के लिए ही नहीं, अपितु न्याय के लिए भी जाने जाते हैं। सबसे पहले हम जिला मुख्यालय अल्मोड़ा से आठ किलोमीटर दूर पिथौरागढ़ राजमार्ग पर स्थित चितई में भगवान शिव के अवतार गोलू (गोलज्यू) देवता के मन्दिर (Golju Temple located in Chitai) पहुंचे। कुमाऊं में गोलज्यू को न्याय का देवता भी कहा जाता है। इसके गर्भगृह में घोड़े पर सवार और धनुष-बाण लिये गोलू देवता की दिव्य प्रतिमा है। मान्यता के अनुसार, इस मन्दिर का निर्माण चन्द वंशीय राजाओं के एक सेनापति ने 12वीं शताब्दी में करवाया था। पहाड़ी पर बसा यह देव स्थान चीड़ के घने जंगलों से घिरा हुआ है। मन्दिर में प्रवेश करते ही अनगिनत घण्टे-घण्टियां नजर आने लगती हैं। श्रद्धालुओं द्वारा मन्नत पूरी होने पर गोलू देवका को अर्पित किए गये इन घण्टे-घण्टियों की कुल संख्या कितनी है, मन्दिर प्रबन्धन भी आज तक नहीं जान पाया है। इसे घण्टियों वाला मन्दिर कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगा।

इस मन्दिर में भक्तों द्वारा मनोकामना पूर्ति और परेशानियों के निवारण के लिए अर्जियां भी लगायी जाती हैं। परिसर में घण्टे-घण्टियों के साथ ही ऐसी हजारों अर्जियां देखी जा सकती हैं। इनमें से कई अर्जियां स्टाम्प पेपर पर होती हैं। माना जाता है कि जिन्हें कहीं से भी (परिवार, सामाज या न्यायालय) से न्याय नहीं मिलता, वे गोलू देवता की शरण में पहुंचते हैं। मन्दिर में बने निर्धारित स्थान पर दो विवाह एक साथ सम्पन्न कराए जा सकते हैं जिसकी व्यवस्था मन्दिर प्रबन्धन द्वारा की जाती है। मन्नत पूरी होने या न्याय मिलने पर श्रद्धालु यहां भण्डारा भी कराते हैं। प्रख्यात साहित्यकार शैलेश मटियानी ने “चौथी मुट्ठी” उपन्यास में गोलू देवता के प्रति लोगों की आस्था का अद्भुत चित्रण किया है।
हाट कालिका मन्दिर की राह पर (On the way to Haat Kalika Temple)

गोलज्यू के दर्शन-पूजन के बाद हम हाट कालिका मन्दिर (Haat Kalika Temple) के लिए रवाना हुए। यहां तक जाने का घुमावदार पर्वतीय मार्ग जितना सुन्दर है, उसके हेयरपिन टर्न उतने ही चुनौतीपूर्ण हैं। बाड़ेछीना, धौलछीना, सेराघाट, राईआगर, गनाई आदि होते हुए और प्रकृति के असीम सौन्दर्य को निहारते, बीच-बीच में रुक कर उसका आनन्द लेते हुए हम गंगोलीहाट की ओर बढ़ते जा रहे थे। प्रातः लगभग 10 बजे हम धौलछीना पहुंचे। यहां से हिमालय की रेंज दिखनी शुरू हो जाती है। मौसम बिल्कुल साफ था। स्वच्छ, श्वेत हिमालय रेंज यहां से केवल एक पहाड़ी दूर लग रही थी। कई स्थानों पर तो यह दूरी इतनी कम लग रही थी कि मन कर रहा था कि अभी सामने वाली पहाड़ी को पार करके हिमालय से लिपट जाऊं। नन्दा देवी, त्रिशूल आदि हिम-शिखर बिल्कुल पास और साफ दिखाई दे रहे थे। एक स्थान पर कार रोकी गयी। हमने जमकर फोटो खींचे और वीडियो बनाए। आगे जगह-जगह मार्ग के दोनों ओर सन्तरी रंग के माल्टे से लदे पेड़ हमें फल तोड़ लेने को मानो ललचा रहे थे। ये दृश्य आजीवन आंखों में बस जाने वाले थे।
हाट कालिका मन्दिर में दर्शन-पूजन (Darshan and worship in Haat Kalika temple)

ऐसे ही शानदार नजारों को देखते हुए हम हाट कालिका मन्दिर (Haat Kalika Temple) पहुंचे। समुद्र तल से 1,760 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह मन्दिर एक सिद्धपीठ है जिसका उल्लेख पुराणों में भी मिलता है। आदि शंकराचार्य ने मन्दिर की स्थापना के लिए इस स्थान का चयन किया था। ऐसा माना जाता है कि देवी काली ने बंगाल से अपना निवास स्थान यहां स्थानान्तरित कर लिया था। हाट कालिका देवी रणभूमि में गये जवानों की रक्षक मानी जाती हैं। भारतीय सेना की कुमाऊं रेजीमेन्ट की यह आराध्य देवी हैं। इस रेजीमेन्ट के रणबांकुरों को यहां पूजा-अर्चना करते देखा जा सकता है। किसी भी बड़े सैन्य अभियान में जाने से पहले माता की विधिवत पूजा की जाती है। रेजीमेन्ट के युद्ध घोष में “कालिका माता की जय” भी शामिल है।
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माता की कृपा से मुझे हाट कालिका के दर्शन करने का सौभाग्य दूसरी बार प्राप्त हुआ। कुछ बरस पहले तक मन्दिर के गर्भगृह तक सभी लोग जा सकते थे किन्तु अब शुद्धता और सुरक्षा की दृष्टि से गेट लगा दिया गया है। इस गेट से ही मां के दर्शन किए जा सकते हैं। मां कालिका की असीम कृपा से मुझे और मेरी बहन को गर्भगृह में जाकर दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मूर्ति पर चुनरी इस तरह से ओढ़ाई गयी थी कि मैया के चेहरे का छोटा-सा हिस्सा ही खुला हुआ था। तीन-चार बरस पहले गर्भगृह के बाहर देवी काली की एक विशाल प्रतिमा स्थापित की गयी थी। श्रद्धालु यहां फोटो खिंचवाना नहीं भूलते। यहां बहुत अधिक बन्दर हैं। उनसे अपने सामान की रक्षा स्वयं करनी पड़ती है अन्यथा वे दर्शनार्थियों का कोई न कोई सामान उठाकर भाग जाते हैं। हमारे सामने ही बन्दर एक श्रद्धालु की प्रसाद की थैली लेकर भाग गया।
मन्दिर में प्रातःकाल मैया को भोग लगाया जाता है। यदि कोई श्रद्धालु किसी दिन का भोग अपने नाम से लगवाना चाहता है तो वह एक दिन पहले मन्दिर समिति को सूचित कर सकता है कि उसकी तरफ से 500, 1100, 2100 रुपये आदि जितने का भी वह भोग लगाना चाहता है, लगाया जाये। भोग लगाने वाले के कहने पर उस दिन का प्रसाद उसके लिए बचाकर रखा जाता है। भक्त मन्दिर में दिन में किसी भी समय पहुंच कर उस प्रसाद को ग्रहण कर सकते हैं। माना जाता है कि भोग का फल भोग लगाने वाले को तभी प्राप्त होता है जब वह उस प्रसाद को ग्रहण करता है।
हाट कालिका क्षेत्र देवदार के जंगलों से घिरा हुआ है। यहां का प्राकृतिक सौन्दर्य अद्वितीय है और यहां इतनी शान्ति मिलती है कि वापस जाने का मन ही नहीं करता।
चार धाम के समान पाताल भुवनेश्वर (Patal Bhubaneswar like Char Dham)

अब हम पाताल भुवनेश्वर गुफा (Patal Bhuvaneshwar Cave) की ओर बढ़े। यह गुफा गंगोलीहाट से करीब 14 किलोमीटर दूर तथा भूमि की सतह से 90 फीट नीचे है और लगभग 160 वर्ग मीटर क्षेत्र में विस्तृत है। पुराणों के मुताबिक पाताल भुवनेश्वर के अलावा कोई ऐसा स्थान नहीं है जहां एकसाथ चारों धाम के दर्शन होते हों। यह पवित्र एवं रहस्यमयी गुफा अपने आप में सदियों का इतिहास समेटे हुए है। मान्यता है कि इस गुफा में 33 कोटि देवी-देवताओं ने अपना निवास स्थान बना रखा है। कहा जाता है कि त्रेता युग के सूर्यवंशी राजा ऋतुपर्ण ने सबसे पहले इस गुफा की खोज की थी। उसके बाद द्वापर युग में पांडवों ने अज्ञातवास के समय इस गुफा को पुनः खोजा और यहां भगवान शिव की पूजा की। कलियुग में इस गुफा की खोज आदि शंकराचार्य ने की।
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इस गुफा में प्रवेश करने के लिए बहुत ही संकरे रास्ते से होकर गुज़रना पड़ता है जिसके कारण कई लोग घबरा जाते हैं और गुफा के अन्दर नहीं जाते। मान्यता है कि इस गुफा में पवित्र मन लेकर जाने पर ही प्रवेश किया जा सकता है अन्यथा गुफा की पहली सीढ़ी पर पैर रखते ही चक्कर आने लगते हैं और पैर हटाते ही व्यक्ति सामान्य हो जाता है। गुफा के अन्दर मोटा व्यक्ति भी प्रवेश कर जाता है जबकि आस्थाहीन दुबला-पतला व्यक्ति भी प्रवेश नहीं कर पाता है। ऐसा हमने स्वयं अपनी आंखों से देखा। गुफा में एक ओर चट्टानों पर एक ऐसी आकृति बनी हुई है जो दिखने में देवराज इन्द्र के वाहन सौ पैरों वाले एरावत हाथी जैसी लगती है। इसके दूसरी ओर नागराज अधिशेष की आकृति दिखाई देती है। माना जाता है कि अधिशेष ने अपने सिर पर पूरी दुनिया को उठाया हुआ है। गुफा में कहीं बह्मा, विष्णु, महेश आदि देवी-देवता विराजमान हैं तो कहीं चमकीले श्वेत चट्टानों पर महादेव शिव की जटाओं से निकलती गंगा के दर्शन होते हैं।

पौराणिक मान्यता के अनुसार, इस गुफा मन्दिर में ही भगवान गणेश के कटे हुए सिर को स्थापित किया गया था। यहां रणद्वार, धर्मद्वार, पापद्वार और मोक्षद्वार नाम से चार दरवाजे माने जाते हैं। रावण की मृत्यु के बाद पापद्वार बन्द हो गया था। कुरुक्षेत्र में हुए धर्मयुद्ध के बाद रणद्वार को भी बन्द कर दिया गया। अब केवल एक द्वार का मुंह थोड़ा-सा खुला हुआ है जो धीरे-धीरे बन्द हो रहा है। ऐसा माना जाता है कि जिस दिन यह द्वार भी बन्द हो जाएगा, उस दिन प्रलय होकर कलियुग का अन्त हो जाएगा और पुनः सतयुग प्रारम्भ होगा।

स्कन्द पुराण में उल्लेख है कि खुद महादेव शिव पाताल भुवनेश्वर में रहते हैं और अन्य देवी-देवता उनकी पूजा करने यहां आते हैं। लोगों का विश्वास है कि पाताल भुवनेश्वर गुफा मन्दिर के दर्शन करने से उत्तराखण्ड की चार धाम यात्रा के समान पुण्य मिलता है। अद्भुत है पाताल भुवनेश्वर गुफा मन्दिर का रहस्य। यह पौराणिक स्थल प्रकृति द्वारा निर्मित विभिन्न कलाकृतियों से रचा गयी है।
अल्मोड़ा को वापसी (Rreturn to almora)

गुफा मन्दिर के दर्शन के पश्चात हमने वापस अल्मोड़ा की ओर प्रस्थान किया। सभी को भूख लगी थी। रास्ते में एक खेत में छोटी-सी झोपड़ी में चाय की दुकान थी। सामने एक-दो पक्के मकान बने हुए थे, कुछ बन भी रहे थे। दुकानदार ने एक खेत में धूप में हमारे बैठने के लिए एक बड़ी-सी चटाई बिछा दी। गुनगुनी धूप में बैठकर हमने अपने साथ लाये खाने के साथ ही पकोड़ी, भांग की चटनी, जलेबी और चाय का भरपूर स्वाद लिया। आसपास की हरीभरी पहाड़ियां और उनके बीच से दर्शन देते हिमालय के श्वेत शिखर मन को मोहित कर रहे थे। कुछ समय वहां बिताकर और प्राकृतिक दृश्यों का आनन्द लेने के बाद हम पुनः अल्मोड़ा की ओर चल दिए और रात्रि 09.30 बजे अपने गन्तव्य पर पहुंच गये। (जारी)
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