एकाम्बरेश्वर मन्दिर का निर्माण सातवीं शताब्दी में चोल साम्राज्य के राजा पल्ल्व ने करवाया था। करीब 25 एकड़ के विशाल परिसर में स्थित यह मन्दिर 11 मन्जिल ऊंचा है और भारत के 10 सबसे बड़े मन्दिरों में शामिल है। इस मन्दिर को पंचभूत स्थलम के पांच पवित्र शिव मन्दिरों में से एक का दर्जा प्राप्त है।
न्यूज हवेली नेटवर्क
दक्षिण भारत में विशाल और उत्कृष्ट शिल्प वाले भवनों के निर्माण की अत्यंत समृद्ध परम्परा रही है। यहां के मन्दिरों में इसका चरम देखा जा सकता है। इन्हें देखकर एकबारगी विश्वास करना मुश्किल हो जाता है कि क्या समचमुच इन्हें मानवों ने ही बनाया है और वह भी किसी तरह की मशीनों के इस्तेमाल के बगैर। वास्तुकला का ऐसा ही एक अप्रतिम उदाहरण है एक हजार खम्भों वाला एकाम्बरेश्वर मन्दिर (Ekambareshwar Temple) । तमिलनाडु के तीर्थ-नगर कांचीपुरम में स्थित भगवान शिव को समर्पित इस मन्दिर को एकाम्बरनाथ मन्दिर भी कहा जाता है। एकाम्बरेश्वर मन्दिर, वरदराज पेरुमाल मन्दिर और कामाक्षी अम्मन मन्दिर को सामूहिक रूप से “मूमुर्तिवासम्” कहा जाता है, यानि “त्रिमूर्तिवास”। (Ekambareshwar: The thousand-pillared temple of the pilgrim town of Kanchipuram)
एकाम्बरेश्वर मन्दिर (Ekambareshwar Temple) का निर्माण सातवीं शताब्दी में चोल साम्राज्य के राजा पल्ल्व ने करवाया था। करीब 25 एकड़ के विशाल परिसर में स्थित यह मन्दिर 11 मन्जिल ऊंचा है और भारत के 10 सबसे बड़े मन्दिरों में शामिल है। इस मन्दिर को पंचभूत स्थलम के पांच पवित्र शिव मन्दिरों में से एक का दर्जा प्राप्त है और यह पृथ्वी तत्व का प्रतिनिधित्व करता है। भगवान शिव को यहां पृथ्वी तत्व के रूप में ही पूजा जाता है और “पृथ्वी लिंगम” कहा जाता है। मन्दिर के गर्भगृह में कुल 1008 शिवलिंग हैं। सहस्त्र स्तम्भों के विशाल मण्डप से युक्त इस मन्दिर का गोपुरम कांचीपुरम के सर्वाधिक ऊंचे गोपुरमों में से एक है।
मन्दिर के पीछे बने चबूतरे पर लगभग 3,500 साल पुराना आम का वृक्ष है। कहा जाता है कि इसी वृक्ष के नीचे देवी पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए कठोर तप किया था। भगवान शिव प्रसन्न होने के बाद इस आम्र वृक्ष में प्रकट हुए, इसलिए उनका नाम एकाम्बरेश्वर (Ekambareshwar) अर्थात “आम वृक्ष का देवता” पड़ा। इसके वृक्ष के तने को काट कर मन्दिर में धरोहर के रूप में रखा गया है। यह वृक्ष चार वेदों का प्रतीक माना जाता है। आम के वृक्ष के निकट ही एक शिला पर श्रीयन्त्र उत्कीर्ण है।

10वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने इस मन्दिर का पुनर्निर्माण करवाया था। 15वीं सदी में विजयनगर के सम्राटों द्वारा राजगोपुरम सहित बड़े पैमाने पर नवनिर्माण कार्य कराये गये। तंजावूर के नायकों का भी इस मन्दिर परिसर के निर्माण में बड़ा योगदान रहा है। कांचीपुरम का सबसे बड़ा मन्दिर होने के साथ ही यह विजयनगर वंश का उच्च प्रतीक है।
विजयनगर के सम्राट कृष्णदेवराय ने यहां 59 मीटर ऊंचा गोपुरम (मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार) बनवाया था। यह गोपुरम 11 तल का है। इसके निचले दो माले भस्म वर्ण के हैं। गोपुरम के ऊपर धातु के 11 कलश हैं जिन्हें शुभ और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। अविराम काल मण्डपम मन्दिर के मुख्य आकर्षण में से एक है जिसमें 1000 खम्भे हैं। इन स्तम्भों पर अद्भुत नक्काशी की गई है जो इसकी भव्यता में चार चांद लगा देती है। मन्दिर परिसर के मुख्य चौबारे में प्रवेश करने पर एक विशाल गलियारा है। मन्दिर में ऐसे पांच बड़े गलियारे बने हुए हैं। मन्दिर के मुख्य मण्डप में भगवान शिव विराजमान हैं। एकाम्बरेश्वर मन्दिर का शिवलिंग सामान्य गोलाकार लिंग न होकर शंकु आकार का है। यहां माता पार्वती का कोई मन्दिर नहीं हैं क्योंकि नगर का कामाक्षी मन्दिर उनका प्रतिनिधित्व करता है। मन्दिर के अन्दर एक ढाई फीट लंबा बालू से निर्मित शिवलिंग भी है। इसका जलाभिषेक न कर तैलाभिषेक करके पूजन किया जाता है। श्रद्धालुओं को इस शिवलिंग तक जाने की अनुमति नहीं है।
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बाहरी गलियारे के मध्य एक ऊंचा ध्वजस्तम्भ है। पत्थर के इस स्तम्भ पर सुन्दर नक्काशी है। पास में ही भित्त पर शिव की एक अत्यंत मनोहारी छवी उत्कीर्ण है। गलियारे के एक ओर एक विशाल कुण्ड है। मन्दिर परिसर में मण्डप युक्त एक सुन्दर तालाब है जिसे शिवगंगा तीर्थम कहते हैं। इस सरोवर के मध्य में शिव पुत्र भगवान गणेश की एक मूर्ति स्थापित है।

प्रतिदिन छह बार होती है आरती
एकाम्बरेश्वर मन्दिर में रोजाना छह बार आरती होती हैं- उशथकालम अर्थात् सूर्योदय पूर्व, कलसंथी अर्थात् प्रातःकाल, उछिकालम अर्थात् दोपहर से पूर्व, सयरक्शई अर्थात् सायंकाल के आरम्भ में, इरन्दमकालम अर्थात् रात्रि पूर्व तथा अर्ध जमम अर्थात् रात्रिकाल में। आम लोगों के लिए मन्दिर रोजाना सुबह छह बजे से दोपहर 12:30 बजे तक और शाम को चार बजे से रात्रि 08:30 बजे तक खुलता है। यह मन्दिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधिकार क्षेत्र में आता है। यहां फोटो खींचने की अनुमति है किन्तु गर्भगृह में फोटोग्राफी करने की मनाही है।
एकाम्बरेश्वर मन्दिर परिसर में स्थित अन्य मन्दिर
काली अम्मा मन्दिर : एकाम्बरेश्वर मन्दिर की परिक्रमा शुरू करने पर दाहिनी ओर जो पहला मन्दिर दृष्टिगोचर होगा वह है काली अम्मा मन्दिर। यहां अष्टभुजाधारी काली अम्मा की प्रतिमा के चारों ओर सुनहरी भित्तियां हैं। इस प्रतिमा की विशेषता है देवी के शीश पर स्थित गंगा।

उत्सव मूर्ति मन्दिर : इस छोटे से मन्दिर में उमा एवं महेश की आकर्षक मूर्तियां हैं। आभूषणों एवं वस्त्रों से सज्ज उमा एवं महेश के चारों ओर विशाल आभामंडल भी है। मंदिर के पुजारी के अनुसार ये उत्सव मूर्तियां हैं। उत्सवों में जब भगवान् को पालकी में बैठा कर मन्दिर के बाहर भ्रमण कराया जाता है तब मुख्य प्रतिमा नहीं अपितु इन उत्सव मूर्तियों को पालकियों में बैठाया जाता है। इसके अलावा नटराज मन्दिर के समीप एक अन्य छोटे से मन्दिर के भीतर भी उत्सव मूर्तियां रखी हुई हैं।
सहस्त्रलिंग मन्दिर : एकाम्बरेश्वर मन्दिर परिसर के एक कोने में स्थित इस छोटे से मन्दिर में एक शिवलिंग पर १००८ शिवलिंग निर्मित हैं।
नटराज मन्दिर : परिक्रमा के उत्तरार्ध में गर्भगृह के प्रवेश द्वार के पास स्थित एक कक्ष में भगवान शिव के नटराज स्वरूप की भव्य प्रतिमा है। इसे भारत में मौजूद सर्वाधिक आकर्षक नटराज प्रतिमाओं में से एक माना जाता है। शिव के इस संहार स्वरूप की यहां पूजा की जाती है।
विरूपाक्ष मन्दिर : कुरूप आंखों वाले शिव का धाम
महाविष्णु मन्दिर : परिक्रमा के अंतिम चरण में गर्भगृह के समीप भगवान विष्णु को समर्पित यह एक छोटा मन्दिर है। इसे भगवान विष्णु के 108 दिव्य देशम में से एक माना जाता है। यहां पुजारी चांदी का आशीर्वाद-पात्र भक्तों के सिर पर रख कर भगवान विष्णु का आशीर्वाद उन तक पहुंचाते हैं।
मन्दिर को लेकर प्रचलित लोककथा

एकाम्बरेश्वर मन्दिर परिसर में आम का एक प्राचीन वृक्ष है जिसके बारे में मान्यता है कि यह साढ़े तीन हजार से चार हजार साल पुराना है। इस पेड़ की हर शाखा पर अलग-अलग रंग के आम लगते हैं और इनका स्वाद भी अलग-अलग होता है। लोक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए आम के इसी पेड़ के नीचे मिट्टी और बालू से एक शिवलिंग बनाकर घोर तपस्या करनी शुरू कर दी। ध्यानस्थ शिव को देवी पार्वती के तप के बारे में पता चला तो उनकी परीक्षा लेने के उद्देश्य से अपनी जटा से गंगाजल से सब जगह पानी-पानी कर दिया। जल के तेज गति से पूजा में बाधा पड़ने लगी। इस पर देवी पार्वती ने शिवलिंग को बचाने के लिए उसे अपने गले से लगा लिया। आशुतोष भगवान शिवशंकर यह सब देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए और देवी पार्वती को दर्शन दिये। वरदान मांगने को कहा तो देवी पार्वती ने उनके साथ विवाह की इच्छा व्यक्त की। महादेव ने देवी पार्वती की इच्छा पूरी करते हुए उनके साथ विवाह कर लिया। माता पार्वती को घोर तप का साक्षी यह आम्र वृक्ष यहां आज भी मौजूद है। शिव-पार्वती के विवाह का उत्सव आज भी फाल्गुन मास में कांचीपुरम के मन्दिरों में मनाया जाता है। इस कथा में पार्वती को कामाक्षी भी कहा गया है। एकाम्बरेश्वर मन्दिर का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उत्सव है ब्रह्मोत्सव (फाल्गुनी उथीरम )। यह 13 दिवसीय उत्सव फाल्गुन मास में आयोजित होता है।

ऐसे पहुंचें एकाम्बरेश्वर मन्दिर

तीर्थ-नगर कांचीपुरम तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई से लगभग 70 किलोमीटर है। एकाम्बरेश्वर मन्दिर कांचीपुरम बस स्टेशन से दो किमी जबकि रेलवे स्टेशन से करीब आधा किमी दूर है। चेन्नई अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डा देश-दुनिया के सभी प्रमुख स्थानों से हवाई मार्ग से जुड़ा है। चेन्नई से कांचीपुरम के लिए सरकारी एवं निजी बसें तथा टैक्सियां आसानी से मिल जाती हैं। दिल्ली के नयी दिल्ली और हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशनों, चेन्नई, मुम्बई आदि से भी कांचीपुरम के लिए ट्रेन सेवा उपलब्ध है।
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