जयशंकर प्रसाद के गीत
बीती विभावरी जाग री! बीती विभावरी जाग री! अम्बर पनघट में डुबो रही तारा-घट ऊषा नागरी! खग-कुल कुल-कुल-सा बोल रहा किसलय का अंचल डोल रहा लो यह लतिका भी भर…
बीती विभावरी जाग री! बीती विभावरी जाग री! अम्बर पनघट में डुबो रही तारा-घट ऊषा नागरी! खग-कुल कुल-कुल-सा बोल रहा किसलय का अंचल डोल रहा लो यह लतिका भी भर…
हम तो बाबुल तोरे आंगन की चिरिया अरे चुगे, पिए, उड़ जाए, लखिया बाबुल मोरे, काहे को ब्याहे बिदेस अमीर खुसरो ——————————- ख्वाजा जी सुन ली हमरे जियरा की पीर…
बच्चे में कितना त्याग, कितना सद्भाव और कितना विवेक है! दूसरों को खिलौने लेते और मिठाई खाते देखकर इसका मन कितना ललचाया होगा? इतना जब्त इससे हुआ कैसे? वहाँ भी…